गुप्त-सप्तशती

गुप्त-सप्तशती
सात सौ मन्त्रों की ‘श्री दुर्गा सप्तशती, का पाठ करने से साधकों का जैसा कल्याण होता है, वैसा-ही कल्याणकारी इसका पाठ है। यह ‘गुप्त-सप्तशती’ प्रचुर मन्त्र-बीजों के होने से आत्म-कल्याणेछु साधकों के लिए अमोघ फल-प्रद है।
इसके पाठ का क्रम इस प्रकार है। प्रारम्भ में ‘कुञ्जिका-स्तोत्र’, उसके बाद ‘गुप्त-सप्तशती’, तदन्तर ‘स्तवन‘ का पाठ करे।

कुञ्जिका-स्तोत्र
।।पूर्व-पीठिका-ईश्वर उवाच।।
श्रृणु देवि, प्रवक्ष्यामि कुञ्जिका-मन्त्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेन चण्डीजापं शुभं भवेत्‌॥1॥
न वर्म नार्गला-स्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्‌।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासं च न चार्चनम्‌॥2॥
कुञ्जिका-पाठ-मात्रेण दुर्गा-पाठ-फलं लभेत्‌।
अति गुह्यतमं देवि देवानामपि दुर्लभम्‌॥ 3॥
गोपनीयं प्रयत्नेन स्व-योनि-वच्च पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌। 
पाठ-मात्रेण संसिद्धिः कुञ्जिकामन्त्रमुत्तमम्‌॥ 4॥

अथ मंत्र

ॐ श्लैं दुँ क्लीं क्लौं जुं सः ज्वलयोज्ज्वल ज्वल प्रज्वल-प्रज्वल प्रबल-प्रबल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा
॥ इति मंत्रः॥
इस ‘कुञ्जिका-मन्त्र’ का यहाँ दस बार जप करे। इसी प्रकार ‘स्तव-पाठ’ के अन्त में पुनः इस मन्त्र का दस बार जप कर ‘कुञ्जिका स्तोत्र’ का पाठ करे।

।।कुञ्जिका स्तोत्र मूल-पाठ।।
नमस्ते रुद्र-रूपायै, नमस्ते मधु-मर्दिनि। 
नमस्ते कैटभारी च, नमस्ते महिषासनि॥
नमस्ते शुम्भहंत्रेति, निशुम्भासुर-घातिनि।
जाग्रतं हि महा-देवि जप-सिद्धिं कुरुष्व मे॥
ऐं-कारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रति-पालिका॥
क्लीं-कारी कामरूपिण्यै बीजरूपा नमोऽस्तु ते।
चामुण्डा चण्ड-घाती च यैं-कारी वर-दायिनी॥
विच्चे नोऽभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणि॥
धां धीं धूं धूर्जटेर्पत्नी वां वीं वागेश्वरी तथा।
क्रां क्रीं श्रीं मे शुभं कुरु, ऐं ॐ ऐं रक्ष सर्वदा।।
ॐ ॐ ॐ-कार-रुपायै, ज्रां-ज्रां ज्रम्भाल-नादिनी। 
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि, शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥
ह्रूं ह्रूं ह्रूं-काररूपिण्यै ज्रं ज्रं ज्रम्भाल-नादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवानि ते नमो नमः॥7॥
।।मन्त्र।।
अं कं चं टं तं पं यं शं बिन्दुराविर्भव, आविर्भव, हं सं लं क्षं मयि जाग्रय-जाग्रय, त्रोटय-त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा, खां खीं खूं खेचरी तथा॥
म्लां म्लीं म्लूं दीव्यती पूर्णा, कुञ्जिकायै नमो नमः।।
सां सीं सप्तशती-सिद्धिं, कुरुष्व जप-मात्रतः॥
इदं तु कुञ्जिका-स्तोत्रं मंत्र-जाल-ग्रहां प्रिये। 
अभक्ते च न दातव्यं, गोपयेत् सर्वदा श्रृणु।।
कुंजिका-विहितं देवि यस्तु सप्तशतीं पठेत्‌।
न तस्य जायते सिद्धिं, अरण्ये रुदनं यथा॥
। इति श्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्‌ । 

गुप्त-सप्तशती
ॐ ब्रीं-ब्रीं-ब्रीं वेणु-हस्ते, स्तुत-सुर-बटुकैर्हां गणेशस्य माता।
स्वानन्दे नन्द-रुपे, अनहत-निरते, मुक्तिदे मुक्ति-मार्गे।।
हंसः सोहं विशाले, वलय-गति-हसे, सिद्ध-देवी समस्ता।
हीं-हीं-हीं सिद्ध-लोके, कच-रुचि-विपुले, वीर-भद्रे नमस्ते।।१

ॐ हींकारोच्चारयन्ती, मम हरति भयं, चण्ड-मुण्डौ प्रचण्डे।
खां-खां-खां खड्ग-पाणे, ध्रक-ध्रक ध्रकिते, उग्र-रुपे स्वरुपे।।
हुँ-हुँ हुँकांर-नादे, गगन-भुवि-तले, व्यापिनी व्योम-रुपे।
हं-हं हंकार-नादे, सुर-गण-नमिते, चण्ड-रुपे नमस्ते।।२

ऐं लोके कीर्तयन्ती, मम हरतु भयं, राक्षसान् हन्यमाने।
घ्रां-घ्रां-घ्रां घोर-रुपे, घघ-घघ-घटिते, घर्घरे घोर-रावे।।
निर्मांसे काक-जंघे, घसित-नख-नखा, धूम्र-नेत्रे त्रि-नेत्रे।
हस्ताब्जे शूल-मुण्डे, कुल-कुल ककुले, सिद्ध-हस्ते नमस्ते।।३

ॐ क्रीं-क्रीं-क्रीं ऐं कुमारी, कुह-कुह-मखिले, कोकिलेनानुरागे।
मुद्रा-संज्ञ-त्रि-रेखा, कुरु-कुरु सततं, श्री महा-मारि गुह्ये।।
तेजांगे सिद्धि-नाथे, मन-पवन-चले, नैव आज्ञा-निधाने।
ऐंकारे रात्रि-मध्ये, स्वपित-पशु-जने, तत्र कान्ते नमस्ते।।४

ॐ व्रां-व्रीं-व्रूं व्रैं कवित्वे, दहन-पुर-गते रुक्मि-रुपेण चक्रे।
त्रिः-शक्तया, युक्त-वर्णादिक, कर-नमिते, दादिवं पूर्व-वर्णे।।
ह्रीं-स्थाने काम-राजे, ज्वल-ज्वल ज्वलिते, कोशिनि कोश-पत्रे।
स्वच्छन्दे कष्ट-नाशे, सुर-वर-वपुषे, गुह्य-मुण्डे नमस्ते।।५

ॐ घ्रां-घ्रीं-घ्रूं घोर-तुण्डे, घघ-घघ घघघे घर्घरान्याङि्घ्र-घोषे।
ह्रीं क्रीं द्रूं द्रोञ्च-चक्रे, रर-रर-रमिते, सर्व-ज्ञाने प्रधाने।।
द्रीं तीर्थेषु च ज्येष्ठे, जुग-जुग जजुगे म्लीं पदे काल-मुण्डे।
सर्वांगे रक्त-धारा-मथन-कर-वरे, वज्र-दण्डे नमस्ते।।६

ॐ क्रां क्रीं क्रूं वाम-नमिते, गगन गड-गडे गुह्य-योनि-स्वरुपे।
वज्रांगे, वज्र-हस्ते, सुर-पति-वरदे, मत्त-मातंग-रुढे।।
स्वस्तेजे, शुद्ध-देहे, लल-लल-ललिते, छेदिते पाश-जाले।
किण्डल्याकार-रुपे, वृष वृषभ-ध्वजे, ऐन्द्रि मातर्नमस्ते।।७

ॐ हुँ हुँ हुंकार-नादे, विषमवश-करे, यक्ष-वैताल-नाथे।
सु-सिद्धयर्थे सु-सिद्धैः, ठठ-ठठ-ठठठः, सर्व-भक्षे प्रचण्डे।।
जूं सः सौं शान्ति-कर्मेऽमृत-मृत-हरे, निःसमेसं समुद्रे।
देवि, त्वं साधकानां, भव-भव वरदे, भद्र-काली नमस्ते।।८

ब्रह्माणी वैष्णवी त्वं, त्वमसि बहुचरा, त्वं वराह-स्वरुपा।
त्वं ऐन्द्री त्वं कुबेरी, त्वमसि च जननी, त्वं कुमारी महेन्द्री।।
ऐं ह्रीं क्लींकार-भूते, वितल-तल-तले, भू-तले स्वर्ग-मार्गे।
पाताले शैल-श्रृंगे, हरि-हर-भुवने, सिद्ध-चण्डी नमस्ते।।९

हं लं क्षं शौण्डि-रुपे, शमित भव-भये, सर्व-विघ्नान्त-विघ्ने।
गां गीं गूं गैं षडंगे, गगन-गति-गते, सिद्धिदे सिद्ध-साध्ये।।
वं क्रं मुद्रा हिमांशोर्प्रहसति-वदने, त्र्यक्षरे ह्सैं निनादे।
हां हूं गां गीं गणेशी, गज-मुख-जननी, त्वां महेशीं नमामि।।१०

स्तवन
या देवी खड्ग-हस्ता, सकल-जन-पदा, व्यापिनी विशऽव-दुर्गा।
श्यामांगी शुक्ल-पाशाब्दि जगण-गणिता, ब्रह्म-देहार्ध-वासा।।
ज्ञानानां साधयन्ती, तिमिर-विरहिता, ज्ञान-दिव्य-प्रबोधा।
सा देवी, दिव्य-मूर्तिर्प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे।।१

ॐ हां हीं हूं वर्म-युक्ते, शव-गमन-गतिर्भीषणे भीम-वक्त्रे।
क्रां क्रीं क्रूं क्रोध-मूर्तिर्विकृत-स्तन-मुखे, रौद्र-दंष्ट्रा-कराले।।
कं कं कंकाल-धारी भ्रमप्ति, जगदिदं भक्षयन्ती ग्रसन्ती-
हुंकारोच्चारयन्ती प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे।।२

ॐ ह्रां ह्रीं हूं रुद्र-रुपे, त्रिभुवन-नमिते, पाश-हस्ते त्रि-नेत्रे।
रां रीं रुं रंगे किले किलित रवा, शूल-हस्ते प्रचण्डे।।
लां लीं लूं लम्ब-जिह्वे हसति, कह-कहा शुद्ध-घोराट्ट-हासैः।
कंकाली काल-रात्रिः प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे।।३

ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोर-रुपे घघ-घघ-घटिते घर्घराराव घोरे।
निमाँसे शुष्क-जंघे पिबति नर-वसा धूम्र-धूम्रायमाने।।
ॐ द्रां द्रीं द्रूं द्रावयन्ती, सकल-भुवि-तले, यक्ष-गन्धर्व-नागान्।
क्षां क्षीं क्षूं क्षोभयन्ती प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे।।४

ॐ भ्रां भ्रीं भ्रूं भद्र-काली, हरि-हर-नमिते, रुद्र-मूर्ते विकर्णे।
चन्द्रादित्यौ च कर्णौ, शशि-मुकुट-शिरो वेष्ठितां केतु-मालाम्।।
स्त्रक्-सर्व-चोरगेन्द्रा शशि-करण-निभा तारकाः हार-कण्ठे।
सा देवी दिव्य-मूर्तिः, प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे।।५

ॐ खं-खं-खं खड्ग-हस्ते, वर-कनक-निभे सूर्य-कान्ति-स्वतेजा।
विद्युज्ज्वालावलीनां, भव-निशित महा-कर्त्रिका दक्षिणेन।।
वामे हस्ते कपालं, वर-विमल-सुरा-पूरितं धारयन्ती।
सा देवी दिव्य-मूर्तिः प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे।।६

ॐ हुँ हुँ फट् काल-रात्रीं पुर-सुर-मथनीं धूम्र-मारी कुमारी।
ह्रां ह्रीं ह्रूं हन्ति दुष्टान् कलित किल-किला शब्द अट्टाट्टहासे।।
हा-हा भूत-प्रभूते, किल-किलित-मुखा, कीलयन्ती ग्रसन्ती।
हुंकारोच्चारयन्ती प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे।।७

ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं कपालीं परिजन-सहिता चण्डि चामुण्डा-नित्ये।
रं-रं रंकार-शब्दे शशि-कर-धवले काल-कूटे दुरन्ते।।
हुँ हुँ हुंकार-कारि सुर-गण-नमिते, काल-कारी विकारी।
त्र्यैलोक्यं वश्य-कारी, प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे।।८

वन्दे दण्ड-प्रचण्डा डमरु-डिमि-डिमा, घण्ट टंकार-नादे।
नृत्यन्ती ताण्डवैषा थथ-थइ विभवैर्निर्मला मन्त्र-माला।।
रुक्षौ कुक्षौ वहन्ती, खर-खरिता रवा चार्चिनि प्रेत-माला।
उच्चैस्तैश्चाट्टहासै, हह हसित रवा, चर्म-मुण्डा प्रचण्डे।।९

ॐ त्वं ब्राह्मी त्वं च रौद्री स च शिखि-गमना त्वं च देवी कुमारी।
त्वं चक्री चक्र-हासा घुर-घुरित रवा, त्वं वराह-स्वरुपा।।
रौद्रे त्वं चर्म-मुण्डा सकल-भुवि-तले संस्थिते स्वर्ग-मार्गे।
पाताले शैल-श्रृंगे हरि-हर-नमिते देवि चण्डी नमस्ते।।१०

रक्ष त्वं मुण्ड-धारी गिरि-गुह-विवरे निर्झरे पर्वते वा।
संग्रामे शत्रु-मध्ये विश विषम-विषे संकटे कुत्सिते वा।।
व्याघ्रे चौरे च सर्पेऽप्युदधि-भुवि-तले वह्नि-मध्ये च दुर्गे।
रक्षेत् सा दिव्य-मूर्तिः प्रदहतु दुरितं मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे।।११

इत्येवं बीज-मन्त्रैः स्तवनमति-शिवं पातक-व्याधि-नाशनम्।
प्रत्यक्षं दिव्य-रुपं ग्रह-गण-मथनं मर्दनं शाकिनीनाम्।।
इत्येवं वेद-वेद्यं सकल-भय-हरं मन्त्र-शक्तिश्च नित्यम्।
मन्त्राणां स्तोत्रकं यः पठति स लभते प्रार्थितां मन्त्र-सिद्धिम्।।१२

चं-चं-चं चन्द्र-हासा चचम चम-चमा चातुरी चित्त-केशी।
यं-यं-यं योग-माया जननि जग-हिता योगिनी योग-रुपा।।
डं-डं-डं डाकिनीनां डमरुक-सहिता दोल हिण्डोल डिम्भा।
रं-रं-रं रक्त-वस्त्रा सरसिज-नयना पातु मां देवि दुर्गा।।१३

27 टिप्पणियाँ »

  1. arun said

    मै यह जानना चाहता हूँ कि सिद्ध कुंजिका स्तोत्र मंत्र जो गीता प्रेस कि किताबों में है यह उससे कुछ भिन्न है क्या यह पुनः जाँच कर लिया गया है कि इसका आलेख सुध है
    नवरात्री के प्रथम दिवस पर ही अचानक इस साईट पर दृष्टि पड़ी
    आपके श्रम साध्य कार्य को विनम्र नमन माँ दुर्गा की कृपा बनी रहे

  2. kaushalsharma said

    atiii subha karya ……kiya aapne magar ek prashan hai . kya yeh strotra purana hai yaa aagee bhee hai .. kyo ki falshruti puri nahee lagti

  3. RAGINI JAISWAL said

    mujhe maa durga k bare mai ur bahati k dara mai apne apko kaise sudh kr apne man ur atma ko sudh rakhu.

  4. RAGINI JAISWAL said

    kaisi sadhna krane s man sudh ur pabitra hota hai ur mai ye bhi khehna chati hu ki mere man me hamesha bure sawal ur bure khayal ate rhte jo ki mujhe nhi pasand mai isse kaise peecha chudu.mai sirf pati ko pyar krti hu ur pati sath hi rehna chati hu.mere lye mere pati hi mera bhagwan hai ur mai sirf uski puja krna chati hun.pr kya kru majboor apne bure khaylo se pls.mujhe rasta batayein ur mujhe aosho ke bare me bhi bahut kuch janna hai.pls.mujhe unse contact karne ka koi rasta batayein.Thank you.

    • Mohit said

      Ragini ji mai aap se age me to chota hoon lakin yadi aap such mein poore man se apne bure vicharo ko apney se door rakhna chahati hain to “Shrimadbhagwat gita” iske liye achook upay hai——aap swami chinmayanand ki shrimadbhagwatgita suniye ye best hai. agar meri reply aap ko sahi lagi ho aur koi solution ya help chahiye ho to mughe mail jaroor kare

    • sachinsharma said

      hi aapke jo man me bure khyal aate hai unka karan aapke man me dabi hui kam ki icha hai aap apne pati ko to payr karti hai par sath me kuch aur b chahti hai aapki likhavat se lagta hai aap jyada akeli rahti hai jyda kam ka veg hone k karan aap iske lia hath paer marti rahti hai meri salah yahi hai ki jyada se jayda sex kare apne pati k sath aur jivan ka annant le kisi b prkar k mantro aadi me padne k bjae kuch ash kam kare jisme aapka man lage jo aapko acha lagta ho tabi bure vicharo si aapko mukti mil sakegi god bls you

  5. pk tiwari said

    mughe tantr ke bare me bataye

  6. Mangal Singh Negi said

    Apne Maa Bhagwati ke Bare me bahut he achchha likha hai.

  7. anil kumar shukla said

    main shree durga saptshati gita prees ke saptshloki durga, shree durgashatotershatnamstrotam,devyacavacham,arglastortam ,ath tamtroctn ratresuktam,ecadashadyay upto 35,ath tantrotn devisutram,ath durgadvantreshnammala,sidh kunjikastrotem,arti and shama prathna ka daily path karta hon mera path porn ha ya nahin jai duge

  8. sampoorna Pokhriyal said

    Utkrishta ………..Ma bhagwati ke paath ke prachur mantra bijon ko sahaj uplavdha karakar atyant janopayogi kaarya kiya hai. koti koti naman.

  9. vivek mudgal said

    sir
    i read the kunjika strot on this site i read the sidhkunji regular created by geeta press but both are some line diffrent and some extra words used on this site i want to know that which creation is right .

    • sachinsharma said

      aap agar ma ki krapa pana chahte hai to apni puja path me kisi prakar ka sanshay mat rakhia.jay mata di

      • rajkishor said

        Sir may know what is good thing for life plese Give me some answer.
        1. Who pepol that work hard but he is not suuses the life.

        Thanks for kunjika strot.

  10. KUMAR said

    main shree durga saptshati gita prees ke saptshloki durga, shree durgashatotershatnamstrotam,devyacavacham,arglastortam ,ath tamtroctn ratresuktam,ecadashadyay upto 35,ath tantrotn devisutram,ath durgadvantreshnammala,sidh kunjikastrotem,arti and shama prathna ka daily path karta hon mera path porn ha ya nahin jai duge

  11. jai mata di mata ki bakti jo bhi jis prakar kara unko shub hi hota hia

  12. nisha said

    mai kilak padh k durgasaptshati ka paath karti hu fir pratham adhyay me jo brahma ji k dwara ki gai stuti he wo padh k kunjika paath or fir chhama prarthna padhti hu kya ye kram sahi hai?

  13. sandeep said

    jai maa jhandewali maa sab tera hi tera na kuch mera na kucha tera maa jhandewali sab tera hi tera

  14. ritika said

    mujhe apne ghar ke bare me kuch poochana hai.
    plz mujhe bataiye.
    meri saas mujhe bahut tang karti hai.mujhe bahut taane maarti hai.mai apni saas se kuch bhi nahi keti hoon. usko aage jawab bhi nahi deti hoon.chaye meri galti ho ya na hon.aap mujhe bataye ki mai kya karo.

  15. khanty said

    Shree Swamiji:
    I have two questions if you can help me.
    1. You mentioned that the Matra Gupta Sapta Sati Mantra is complete.It ends at 13th Sloka and it sounds like their something missing. Would you be kind enough to let me know in Which book I will find this Mantra.

    2. Navratra will be starting in next two weeks and I want to do proper Sadhana. Being born and raised in pakistan I don’t have Guru to obtain his blessing and Diksha. And performing Sadhna like Maa Bgla mukhi requires Guru Diksha and Guidance. Is it possible to get Diksha from you with a proper guidance? Is there any procedure which will make me take diksha from far away from you? I am rady to do that. OR if suggest anything to win delicate and serious court case. Please help.

    Pranam
    KK

  16. rangesh tripathi said

    mai bahoot garib hoon mujhe dhan chahiye please mujhe koi rasta batayen.

  17. Khanty said

    Shree Swamiji:
    My appologies for anything offensive but I have not yet heard from you of my original request on September 23. I am reposting the request again only 6 days are left for Durga Asthmi. May I please hear from you. My gratitude in advance:

    I have two questions if you can help me.
    1. You mentioned that the Matra Gupta Sapta Sati Mantra is complete or there are more Sloka after the verse 13? It ends at 13th Sloka and it sounds like their something missing. Would you be kind enough to let me know in Which book I will find this Mantra.

    2. Navratra will be starting in next two weeks and I want to do proper Sadhana. Being born and raised in Pakistan I don’t have Guru to obtain his blessing and Diksha. And performing Sadhna like Maa Bagla Mukhi requires Guru Diksha and Guidance. Is it possible to get Diksha from you with a proper guidance? Is there any procedure which will make me take diksha from far away from you? I am ready and prepared to do that. OR if suggest any other mantra sadhna to win delicate and serious court case. Please help.

    Pranam
    KK

    Kankot3201@yahoo.com

  18. vikas said

    Namaskar,

    mai ek baar maa ka darshan matr karna chahta hu uska liya koi sidhi mantr hai to kirpiya mujha uska bara ma bataian

    Dhanyabad

  19. Rajendra Karahe said

    आदरणीय यह स्तोत्र बतलाने के लिए धन्यवाद. परन्तु यह स्तोत्र गीता प्रेस से प्रकशित पाठ से भिन्न है . यह कौन सी पुस्तक से लिया गया है .

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